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कबहू उझकि कबहू उलटि !
कबहू उझकि कबहू उलटि ! (मधुगीति १६०३०६ ब) कबहू उझकि कबहू उलटि, ग्रीवा घुमा जग कूँ निरखि; रोकर विहँसि तुतला कभी, जिह्वा कछुक बोलन चही ! पहचानना आया अभी, है द्रष्टि अब जमने लगी; हर चित्र वह देखा किया,…