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मेरा माहताब…
इक पल मुट्ठी में था सब कुछ, अगले पल रेत सा फिसल गया, था शामिल मुझमें यूँ तो, न जाने कब वो निकल गया। कल तक था जो हमराह मेरा, रस्ता उसका भी बदल गया, दिल ही तो था, कोई खुदा नहीं, उसने बहलाया, बहल गया।…