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शायरी – सांसों की कशमकश में कितने शहर बदल चुके
शायरी मोम सा जलते रहे हम चांद की खातिर रातभर बुझ गए हैं आज हम जो पूरी तरह पिघल चुके एक जगह रुकने से अब घुटता है क्यों दम मेरा सांसों की कशमकश में कितने शहर बदल चुके…