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शायरी – इस मुसाफिर का कोई दर्द तू क्या जाने
ठोकरें खाए हैं कई, राह देखा न कभी तुझे सोचा तो बहुत मगर समझा न कभी रंग शीशे पे चढ़ा तो आईना वो बना फिर खुद को आर-पार देख पाया न कभी…