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शायरी – चल पड़ा हूँ किधर, जाने कौन शहर
चल पड़ा हूँ किधर, जबसे छूटा है घर और बिछड़ा है मेरा हसीं हमसफर चल पड़ा हूँ किधर, जाने कौन शहर अपने साये से रूखसत हुआ था कभी जब दीये बुझ गए मुफ़लिसी में सभी अब अंधेरे में रहता हूँ आठों पहर च…