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शायरी – बस यही सोचके तुम्हें याद किया करता था
शायरी वो भी क्या रातें थी जब खूब जगा करता था क्या खबर थी कि मैं खुद से दगा करता था जो हकीकत भी नहीं था, फसाना भी नहीं मैं कहीं बीच की मंजिल पर रहा करता था…