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शायरी – भटकता हूँ मैं आकाश में एक गजल के लिए
भटकता हूं मैं आकाश में एक गजल के लिए निहारूं चांद-सितारों को एक गजल के लिए कदम जमीन पे चलते हैं निगाहों के बिना ठोकरें खाता हूं मैं राहों में एक गजल के लिए मुहब्बत भी करता हूं, बेवफा भी बनता हूं फि…