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शायरी – जो सुन ना सकी मेरी खामोश सदा
जो सुन ना सकी मेरी खामोश सदा वो नाजनीन मेरे दिल की दरगाहों में है हम तो मुफ़लिस ही रहे मुसलसल दोजख तो आज भी सैरगाहों में है…