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शायरी – आज सब कुछ सूख गया है, रेतों में उम्मीद जगा के
शायरी बैठे-बैठे सोच रही हूं दीवारों से पीठ लगा के खुद को मैं खोज रही हूं, सीने पे खंजर चला के उम्मीदों का सावन कल तक, बरसा था दो आंखों से आज सब कुछ सूख गया है, रेतों में उम्मीद जगा के…