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शायरी – सोलह दरिया पार की तब तेरा शहर मिला
सोलह दरिया पार की तब तेरा शहर मिला तूने सुनी थी जो सदा, मैं वही आवाज़ हूं आग में सुरुर है और दर्द भी मजबूर है जल रहा हूं शौक से, मैं हिज्र का माहताब हूं…