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क्या महफूज़ आज भी दामिनयो का दामन ?
दामिनयों का दामन आज भी न महफूज़ क्यूं? अस्मत पे नापाक निगाहे, पाप की भूख क्यूं ? तीन बरस बाद भी सिलसिले वही बरकरार है रोज नई दामिनी सिसकती,हो रहा तिरस्कार है नाबालिगी ठप्पे से उड़ने को तैयार दरिंद…