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कुदरत
न किसी फरमान , न एहसान की मोहताज होती है कुदरत तो खुद खजानों से , सजा ताज होती है आदिकाल से ले अब तक , लगे सुलझाने जिसे गुत्थियाँ कई है उलझी हुई , वो राज़ होती है तय किया इसने , अपनी रहमतों-नेमतों …