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मेघ मल्हार
मेरे ऊपर घिरी घटाओं..! अच्छा लग रहा है तुम्हारा यह चातुर्दिक विस्तार बावज़ूद इस कम रोशनी के धरा प्रमुदित है पुष्पित और पल्लवित हो रही है आशाओं के नवांकुर फूट रहे है और- पुरातन अंकुर बन कर तरू झूम रह…