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आशियाना…. 
कभी आईना देखा, तो कभी झाँका गेहराइयों मैं, आसमानों की मुलायम पर्दों मैं देखा, तो कभी समुन्दर के अनंत मैं, घर ढूंढ रहा था मैं, ना जाने कहाँ, ना जाने कब, अक्स जो तेरा गिरा था मुझ पर, वो सर्द किसी रात…