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काव्य श्रृंखला – 24
देश में एक बार फिर चुनावी बिसात बिछ चुकी है। दुनिया भर के वादे और आरोपों का दौर चरम पर है। इन सबके बीच जनता खामोश बैठी है। आज इस कविता के माध्यम से हमेशा ही खामोश रहने वाली जनता को एक बार उसके कर्त…