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सावन के जख्म - Kavyakosh - Hindi Poems
सावन के जख्म घनन घनन-घनन घनन देखो कैसे गरजे हैं मेघा फिर से झूम-झूम कर रिझाती काली बदरिया अपने रूठे साजन को नन्ही-नन्ही जल की बूंदें फिर से लेकर आया है बादल बादलों में छिपकर जैसे विरह राग छेड़ा है किसीने सोलह शृंगार के रथ पर सवार फिर से थिरका है पागल सावन सावन के भीगे आँचल तले है पुकारती संतप्त सजना अब तो लौट आओ बेदर्दी प्रियतम इधर सहा ना जाये दर्द विरह का और उधर काली घटा देती जख्म हज़ार क्यों तड़पाते अपनी विरहन को चौमास की रिमझिम बौछारों में मर्म की छटपटाहट तुम क्या जानो बाट Continue reading सावन के जख्म→