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यार, दही और बची है क्या (हास्य-व्यंग) - Kavyakosh - Hindi Poems
यार, दही और बची है क्या (हास्य-व्यंग) मनहूस अमावस, एकाएक प्रियतमा बिछुड़ गयी गम में डूबा पति दहाड़ें मार-मार कर रो रहा था शोकाकुल पति की आवाज सुन पडोसी ने सोचा अर्धरात्रि सरयू घाट पर धोबी कपड़े धो रहा था एक हमदर्द ने पूछा यार क्या हुआ था भाभी को जो देवर को बिन बताये यूँ छोड़ कर चली गयी कल तक खिलाती थी मुझे गरम समोसे बनाकर इस जन्म के सारे सम्बन्ध यूँ तोड़ कर चली गयी दुखियारे पति ने की बयाँ टूटे दिल की दास्तान कुछ नहीं बस, बिल्ली की जूठी दही खा रही थी और दही खाते-खाते ही Continue reading यार, दही और बची है क्या (हास्य-व्यंग)→