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कहीं मैं ही न निपट जाऊँ (हास्य-व्यंग) - Kavyakosh - Hindi Poems
कहीं मैं ही न निपट जाऊँ (हास्य-व्यंग) मन्नत मांगने सुबह-सुबह पति-पत्नी गए शिव मंदिर मन्नत का धागा बाँधने पत्नी ने जैसे ही हाथ उठाया अचानक मन में उसके आया कोई ख्याल पुराना मन्नत का धागा बांधे बिना उसने नीचे हाथ झुकाया हक्का-बक्का बेचारा पति बोला अपनी सुहागन से हे भागवान, क्यों नहीं बाँधा तुमने धागा मन्नत का किस ख्याल में डूबी हो, न करो कोई सोच-विचार बाँध दो धागा अगर भोगना है सुख तुमने जन्नत का पत्नी मुस्कुराकर बोली मन्नत मांगने ही वाली थी मैं कि ईश्वर दूर कर दे मेरे सुहाग की मुश्किलें तमाम फिर मन में विचार आया Continue reading कहीं मैं ही न निपट जाऊँ (हास्य-व्यंग)→