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Kyon phir rahe ho kaif ye khatre ka ghar liye | Shayrana.org
क्यों फिर रहे हो कैफ़ ये ख़तरे का घर लिए ये कांच का शरीर ये काग़ज़ का सर लिए शोले निकल रहे हैं गुलाबों के जिस्म से तितली न जा क़रीब ये रेशम के पर लिए जाने बहार नाम है लेकिन ये काम है कलियां तराश लीं तो कभी गुल क़तर लिए रांझा बने हैं, कैस बने, कोहकन बने हमने किसी के वास्ते सब रूप धर लिए ना मेहरबाने शहर ने ठुकरा दिया मुझे मैं फिर रहा हूं अपना मकां दर-ब-दर लिए Kaifi bhopali