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Nahi minnat- kash-e-taab-e-shanidan dastan meri | Shayrana.org
नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शनीदन दास्ताँ मेरी ख़ामोशी गुफ़्तगू है, बेज़ुबानी है ज़बाँ मेरी ये दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी है कैसी तेरी महफ़िल मेंयहाँ तो बात करने को तरस्ती है ज़बाँ मेरी उठाये कुछ वरक़ लाला ने कुछ नरगिस ने कुछ गुल नेचमन में हर तरफ़ बिखरी हुई है दास्ताँ मेरी उड़ा ली कुमरियों ने तूतियों ने अंदलीबों नेचमन वालों ने मिल कर लूट ली तर्ज़-ए-फ़ुगाँ मेरी टपक ऐ शम आँसू बन के परवाने की आँखों सेसरापा दर्द हूँ हसरत भरी है दास्ताँ मेरी इलाही फिर मज़ा क्या है यहाँ दुनिया में रहने काहयात-ए-जाविदाँ मेरी न मर्ग-ए-नागहाँ मेरी Allama iqbal