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Ajab vaaiz ki deen dari hai ya rab | Shayrana.org
अजब वाइज़ की दीन-दारी है या रब अदावत है इसे सारे जहाँ से कोई अब तक न ये समझा कि इंसाँकहाँ जाता है आता है कहाँ से वहीं से रात को ज़ुल्मत मिली हैचमक तारों ने पाई है जहाँ से हम अपनी दर्दमंदी का फ़सानासुना करते हैं अपने राज़दाँ से बड़ी बारीक हैं वाइज़ की चालेंलरज़ जाता है आवाज़-ए-अज़ाँ से Allama iqbal