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A dard e ishq tujhse mukarne laga hoon main | Shayrana.org
ऐ दर्द-ए-इश्क़ तुझसे मुकरने लगा हूँ मैं मुझको सँभाल हद से गुज़रने लगा हूँ मैं पहले हक़ीक़तों ही से मतलब था, और अब एक-आध बात फ़र्ज़ भी करने लगा हूँ मैं हर आन टूटते ये अक़ीदों के सिलसिले लगता है जैसे आज बिखरने लगा हूँ मैं ऐ चश्म-ए-यार! मेरा सुधरना मुहाल था तेरा कमाल है कि सुधरने लगा हूँ मैं ये मेहर-ओ-माह, अर्ज़-ओ-समा मुझमें खो गये इक कायनात बन के उभरने लगा हूँ मैं इतनों का प्यार मुझसे सँभाला न जायेगा! लोगो! तुम्हारे प्यार से डरने लगा हूँ मैं दिल्ली! कहाँ गयीं तिरे कूचों की रौनक़ें गलियों से सर झुका के गुज़रने लगा हूँ मैं Jaan nissar akhtar