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Nazre galib | Shayrana.org
किसी गुमां पे तवक़्क़ो ज़ियादा रखते हैं फिर आज कू-ए-बुतां का इरादा रखते हैं बहार आयेगी जब आयेगी, यह शर्त नहींकि तश्नाकाम रहें गर्चा बादा रखते हैं तेरी नज़र का गिला क्या जो है गिला दिल कोतो हमसे है तमन्ना ज़ियादा रखते हैं नहीं शराब से रंगी तो ग़र्क़े-ख़ूं हैं के हमख़याले-वज़ाए-क़सीमो-लबादा रखते हैं ग़मे-जहां हो, ग़मे-यार हो कि तीरे-सितमजो आये, आये कि हम दिल कुशादा रखते हैं जवाबे-वाइज़े-चाबुक-ज़बां में फ़ैज़ हमेंयही बहुत है जो दो हर्फ़े-सादा रखते हैं Faiz ahmed faiz