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Yoon bahar aai hai es baar ki jaise qasid | Shayrana.org
यूँ बहार आई है इस बार कि जैसे क़ासिद कूचा-ए-यार से बे-नैलो-मराम आता है हर कोई शहर में फिरता है सलामत-दामनरिंद मयख़ाने से शाइस्ता-ख़राम आता है हवसे-मुतरिबो-साक़ी मे परीशां अकसरअब्र आता है कभी माहे-तमाम आता है शौक़वालों की हज़ीं महफिले-शब में अब भीआमदे सुबह की सूरत तेरा नाम आता है अब भी एलाने-सहर करता हुआ मस्त कोईदाग़े-दिल कर के फ़रोज़ाँ सरे-शाम आता है Faiz ahmed faiz