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Dekhte hi dekhte pehloo badal jaati hai kyun | Shayrana.org
देखते ही देखते पहलू बदल जाती है क्यूँ नींद मेरी आँखों में आते ही जल जाती है क्यूँ।हाथ में 'शाकुंतलम' है और मन में प्रश्न हैयाद की मछली अंगूठी को निगल जाती है क्यूँ।ऐ मुहब्बत, तू तो मेरे मन में खिलता फूल हैतुझसे भी उम्मीद की तितली फिसल जाती है क्यूँ ।इक सुहानी शाम मुझको भी मिेले, चाहा अगरआने से पहले ही फिर वो शाम ढल जाती है क्यूँ ।ये सुना था मौत पीछा कर रही है हर घड़ीज़िन्दगी से मौत फिर आगे निकल जाती है क्यूँ ।मेरे होठों पर हँसी आते ही गालों पर मेरेआंसुओं की एक सन्टी सी उछल जाती है क्यूँ।आंसुओं से जब भी चेहरे को निखारा ऐ 'कुँअर'ज़िन्दगी चुपके से आकर धूल मल जाती है क्यूँ। Kunwar bechain