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Inhi khushgumaniyo me kahin jaan se bhi na jao | Shayrana.org
इन्हीं ख़ुशगुमानियों में कहीं जाँ से भी न जाओ वो जो चारागर नहीं है उसे ज़ख़्म क्यूँ दिखाओ ये उदासियों के मौसम कहीं रायेगाँ न जाएँ किसी ज़ख़्म को कुरेदो किसी दर्द को जगाओ वो कहानियाँ अधूरी जो न हो सकेंगी पूरी उन्हें मैं भी क्यूँ सुनाऊँ उन्हें तुम भी क्यूँ सुनाओ मेरे हमसफ़र पुराने मेरे अब भी मुंतज़िर हैंतुम्हें साथ छोड़ना है तो अभी से छोड़ जाओ ये जुदाइयों के रस्ते बड़ी दूर तक गए हैं जो गया वो फिर न लौटा मेरी बात मान जाओकिसी बेवफ़ा की ख़ातिर ये जुनूँ "फ़राज़" कब तकजो तुम्हें भुला चुका है उसे तुम भी भूल जाओ Ahmed Faraz