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Safar ki had hai wahan tak ki kuch nishaan rahe | Shayrana.org
सफ़र की हद है वहाँ तक कि कुछ निशान रहे| चले चलो के जहाँ तक ये आसमान रहे| ये क्या उठाये क़दम और आ गई मन्ज़िल, मज़ा तो जब है के पैरों में कुछ थकान रहे| वो शख़्स मुझ को कोई जालसाज़ लगता है, तुम उस को दोस्त समझते हो फिर भी ध्यान रहे| मुझे ज़मीं की गहराईयों ने दाब लिया, मैं चाहता था मेरे सर पे आसमान रहे| अब अपने बीच मरासिम नहीं अदावत है, मगर ये बात हमारे ही दर्मियान रहे| मगर सितारों की फसलें उगा सका न कोई, मेरी ज़मीन पे कितने ही आसमान रहे| वो एक सवाल है फिर उस का सामना होगा, दुआ करो कि सलामत मेरी ज़बान रहे| #Rahat_indori