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Rukho ke chand labo ke gulab mange hai | Shayrana.org
रुखों के चांद, लबों के गुलाब मांगे है बदन की प्यास, बदन की शराब मांगे है मैं कितने लम्हे न जाने कहाँ गँवा आया तेरी निगाह तो सारा हिसाब मांगे है मैं किस से पूछने जाऊं कि आज हर कोई मेरे सवाल का मुझसे जवाब मांगे है दिल-ए-तबाह का यह हौसला भी क्या कम है हर एक दर्द से जीने की ताब मांगे है बजा कि वज़ा-ए-हया भी है एक चीज़ मगर निशात-ए-दिल तुझे बे-हिजाब मांगे है Jaan nissar akhtar