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Har lafz tire jism ki khushboo mein dhala hai | Shayrana.org
हर लफ़्ज़ तिरे जिस्म की खुशबू में ढला है ये तर्ज़, ये अन्दाज-ए-सुख़न हमसे चला है अरमान हमें एक रहा हो तो कहें भी क्या जाने, ये दिल कितनी चिताओं में जला है अब जैसा भी चाहें जिसे हालात बना दें है यूँ कि कोई शख़्स बुरा है, न भला है Jaan nissar akhtar