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Har ek soorat har ek tasweer | Shayrana.org
हर इक सूरत हर इक तस्वीर मुबहम होती जाती है इलाही, क्या मिरी दीवानगी कम होती जाती है ज़माना गर्मे-रफ्तारे-तरक्क़ी होता जाता है मगर इक चश्मे -शायर है की पुरनम होती जाती है यही जी चाहता है छेड़ते ही छेड़ते रहिये बहुत दिलकश अदाए-हुस्ने-बरहम होती जाती है तसव्वुर रफ़्ता-रफ़्ता इक सरापा बनाता जाता है वो इक शै जो मुझी में है ,मुजस्सिम होती जाती है वो रह-रहकर गले मिल-मिलके रुख़सत होते जाते है मिरी आँखों से या रब ! रौशनी कम होती जाती है 'जिगर' तेरे सुकूते-ग़म ने ये क्या कह दिया उनसे झुकी पड़ती है नज़रे ,आंख पुरनम होती जाती है Jigar moradabadi