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Sadiya guzar gai | Shayrana.org
क्या जाने किसी की प्यास बुझाने किधर गयीं उस सर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गयीं दीवाना पूछता है यह लहरों से बार बार कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गयीँ अब जिस तरफ से चाहे गुजर जाए कारवां वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गयीं पैमाना टूटने का कोई गम नहीं मुझे गम है तो यह के चाँदनी रातें बिखर गयीं पाया भी उन को खो भी दिया चुप भी यह हो रहे इक मुख्तसर सी रात में सदियाँ गुजर गयीं Kaifi azmi