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Jhooth sachhai ka hissa ho gaya | Shayrana.org
झूठ सच्चाई का हिस्सा हो गया इक तरह से ये भी अच्छा हो गया उस ने इक जादू भरी तक़रीर की क़ौम का नुक़सान पूरा हो गया शहर में दो-चार कम्बल बाँट कर वो समझता है मसीहा हो गया ये तेरी आवाज़ नम क्यूँ हो गई ग़म-ज़दा मैं था तुझे क्या हो गया बे-वफाई आ गई चौपाल तक गाँव लेकिन शहर जैसा हो गया सच बहुत सजता था मेरी ज़ात पर आज ये कपड़ा भी छोटा हो गया Shakeel zamaali