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Ye apna milan jaise ek sham ka manzar hai | Shayrana.org
ये अपना मिलन जैसे इक शाम का मंज़र है, मैं डूबता सूरज हूँ तू बहता समन्दर है । सोने का सनम था वो, सबने उसे पूजा है, उसने जिसे चाहा है वो रेत का पैकर है । जो दूर से चमके हैं वो रेत के ज़र्रे हैं, जो अस्ल में मोती है वो सीप के अन्दर है । दिल और भी लेता चल पहलू में जो मुमकिन हो, उस शोख़ के रस्ते में एक और सितमगर है । दो दोस्त मयस्सर हैं इस प्यार के रस्ते में, इक मील का पत्थर है, इक राह का पत्थर है । सब भूल गया आख़िर पैराक हुनर अपने, अब झील-सी आँखों में मरना ही मुक़द्दर है । अब कौन उठाएगा इस बोझ को किश्ती पर, किश्ती के मुसाफ़िर की आँखों में समन्दर है । Ana kasmi