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कविता: 'कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ' - पुनीत कुसुम - पोषम पा
तुम कहती हो “कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ” मगर, क्यों मान लेती हो? आख़िर, क्यों मान लेती हो? पृथ्वी तो नहीं मानती अपने गुरुत्व को जब तक कोई ज़मीन से अपनी Read more…