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मुन्तज़िर | एहतिशाम आलम
वो भी एक मुद्दत तक मुन्तज़िर रहा अपनी बर्बादी का जिसके आगाज़ में ही उसकी फ़ना तय रही इस वजूद में ना कोई आलम रहा ना बाक़ी कोई शय रही ग़मे विसाल कुछ ऐसा किContinue reading