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हार नहीं मानूंगी
कितनी अजीब हूँ मैं जितनी उदार, करुण उतनी ही सख्त, कठोर वक़्त के थपेड़ो ने बहुत ज़िद्दी बना दिया है मुझे फिर क्यों कभी पाती हूँ स्वम को कमजोर सारी दुनिया से लड़ने की हिम्मत है मुझमे मजबूत इच्छाशक्ति है मेरी स्वं पर विश्वास है मुझे फिर क्यों हार मान जाऊँ इन बाधाओं से, मैं तो नारी शक्ति हूँ कुछ भी कर सकती हूँ बस बहुत हो गया नहीं