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साहित्यम: इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया
तुझ से मिल कर हमें रोना था बहुत रोना था तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया
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