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मुल्ला का कुरता
मुल्ला नसरुद्दीन ने नया कुरता बनवाने के लिए पैसे जमा किये. बड़े जोश-ओ-खरोश से वह दर्जी की दुकान पर गया. नाप लेने के बाद दर्जी ने कहा, "एक हफ्ते के बाद आइये. अल्लाह ने चाहा तो आपका कुरता तैयार मिलेगा ".
हफ्ते भर के इंतज़ार के बाद मुल्ला दुकान पर गया. दर्जी ने कहा, “काम में कुछ देर हो गयी. अल्लाह ने चाहा तो आपका कुरता कल तक तैयार हो जायेगा."
अगले दिन मुल्ला फिर दुकान पर पहुंचा. उसे देखते ही दर्जी ने कहा, "माफ़ करिए, अभी कुछ काम बाकी रह गया है. बस एक दिन की मोहलत और दे दें. अगर अल्लाह ने चाहा तो कल आपका कुरता तैयार हो जाएगा."
"तुम तो मुझे यह बताओ कि इसमें और कितनी देर लगेगी...", मुल्ला ने मन मसोसकर कहा...
"अगर तुम अल्लाह को इससे अलग रखो".
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मुसीबत
नसरुद्दीन एक शाम अपने घर से निकला. उसे
किन्हीं मित्रों के घर उसे मिलने जाना था. वह चला ही था कि दूर गाँव से उसका एक दोस्त जलाल आ गया. नसरुद्दीन ने कहा, "तुम घर @ में ठहरो, मैं जरूरी काम से दो-तीन मित्रों को • मिलने जा रहा हूँ और लौटकर तुमसे मिलूंगा. अगर तुम थके न हो तो मेरे साथ तुम भी चल
सकते हो".
जलाल ने कहा, "मेरे कपड़े सब धूल-मिट्टी से
सन गए हैं. अगर तुम मुझे अपने कपड़े दे दो
तो मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ. तुम्हारे बगैर यहां
बैठकर मैं क्या करूंगा ? इसी बहाने मैं भी तुम्हारे मित्रों से मिल लूँगा". नसरुद्दीन ने अपने सबसे अच्छे कपड़े जलाल को दे दिए और वे दोनों निकल पड़े. जिस पहले घर वे दोनों पहुंचे वहां नसरुद्दीन ने
कहा, "मैं इनसे आपका परिचय करा दूं, ये हैं
मेरे दोस्त जलाल, और जो कपड़े इन्होंने पहने
हैं वे मेरे हैं":
जलाल यह सुनकर बहुत हैरान हुआ. इस सच को कहने की कोई भी जरुरत न थी. बाहर निकलते ही जलाल ने कहा, "कैसी बात करते ने हो, नसरुद्दीन ! कपड़ों की बात उठाने की क्या जरूरत थी? अब देखो, दूसरे घर में कपड़ों की
कोई बात मत उठाना".
वे दूसरे घर पहुंचे. नसरुद्दीन ने कहा, “इनसे परिचय करा दूं. ये हैं मेरे पुराने मित्र जलाल; रही कपड़ों की बात, सो इनके ही हैं, मेरे नहीं हैं". जलाल फिर हैरान हुआ. बाहर निकलकर
उसने कहा, "तुम्हें हो क्या गया है? इस बात
को उठाने की कोई क्या जरूरत थी कि कपड़े
किसके हैं? और यह कहना भी कि इनके ही
हैं, शक पैदा करता है, तुम ऐसा क्यों कर रहे
हो?"
नसरुद्दीन ने कहा, "मैं मुश्किल में पड़ गया. वह पहली बात मेरे मन में गूंजती रह गई, उसकी प्रतिक्रिया हो गई. सोचा कि गलती हो गई. मैंने कहा, कपड़े मेरे हैं तो मैंने कहा, सुधार कर लूं कह दूं कि कपड़े इन्हीं के हैं". जलाल ने कहा, " अब ध्यान रखना कि इसकी बात ही न उठे. यह बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए".
वे तीसरे मित्र के घर पहुंचे. नसरुद्दीन ने कहा, "ये हैं मेरे दोस्त जलाल रही कपड़ों की बात, सो उठाना उचित नहीं है". नसरुद्दीन ने जलाल से पूछा, "ठीक है न, कपड़ों की बात उठाने की कोई ज़रुरत ही नहीं है. कपड़े किसी के भी हों, हमें क्या लेना देना, मेरे हों या इनके हों. कपड़ों की बात उठाने का कोई मतलब नहीं है". बाहर निकलकर जलाल ने कहा, "अब मैं तुम्हारे साथ और नहीं जा सकूंगा. मैं हैरान हूं, तुम्हें हो क्या रहा है?"
नसरुद्दीन बोला, "मैं अपने ही जाल में फंस गया हूं. मेरे भीतर, जो मैं कर बैठा, उसकी प्रतिक्रियाएं हुई चली जा रही हैं. मैंने सोचा कि ये दोनों बातें भूल से हो गयीं, कि मैंने अपना कहा और फिर तुम्हारा कहा. तो मैंने तय किया कि अब मुझे कुछ भी नहीं कहना चाहिए, यही सोचकर भीतर गया था. लेकिन बार-बार यह होने लगा कि यह कपड़ों की बात करना बिलकुल ठीक नहीं है. और उन दोनों की प्रतिक्रिया यह हुई कि मेरे मुंह से यह निकल गया और जब निकल गया तो समझाना जरूरी हो गया कि कपड़े किसी के भी हों, क्या लेना-देना"..
यह जो नसरुद्दीन जिस मुसीबत में फंस गया होगा बेचारा, पूरी मनुष्य जाति ऐसी मुसीबत में फंसी है. एक सिलसिला, एक गलत सिलसिला शुरू हो गया है. और उस गलत सिलसिले के हर कदम पर और गलती बढती चली जाती है. जितना हम उसे सुधारने की कोशिश करते हैं, वह बात उतनी ही उलझती चली जाती है.
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जंगली फूल
सर्दियों का पूरा मौसम नसरुद्दीन ने अपने बगीचे की देखरेख में बिताया. वसंत आते ही हर तरफ मनमोहक फूलों ने अपनी छटा बिखेरी बेहतरीन गुलाबों और दूसरे शानदार फूलों के बीच नसरुद्दीन को कुछ जंगली फूल भी झांकते दिख गए.
नसरुद्दीन ने उन फूलों को उखाड़कर फेंक दिया. कुछ दिनों के भीतर वे जंगली खरपतवार फिर से उग आये. फूल और
नसरुद्दीन ने सोचा क्यों न उन्हें खरपतवार दूर करनेवाली दवा का छिडकाव करके नष्ट कर दिया जाए. लेकिन किसी जानकार ने नसरुद्दीन को बताया कि ऐसी दवाएं अच्छे फूलों को भी कुछ हद तक नुकसान पहुंचाएंगी. निराश होकर नसरुद्दीन ने किसी अनुभवी माली की सलाह लेने का तय किया.
"ये जंगली फूल, ये खरपतवार...", माली ने कहा, "यह तो शादीशुदा होने की तरह है, जहाँ बहुत सी बातें अच्छीं होतीं हैं तो कुछ अनचाही दिक्कतें और तकलीफें भी पैदा हो जातीं हैं".
'अब मैं क्या करूं?", नसरुद्दीन ने पूछा. "तुम अगर उन्हें प्यार नहीं कर सकते हो तो बस नज़रंदाज़ करना सीखो. इन चीज़ों की तुमने कोई ख्वाहिश तो नहीं की थी लेकिन अब वे तुम्हारे बगीचे का हिस्सा बन गयीं हैं."
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मुल्ला नसीरूद्दीन की हाजिर जवाबी
एक बार मुल्ला नसीरूद्दीन ने एक आदमी से कुछ उधार लिया था। मुल्ला समय पर उधार चुका नहीं पाया और उस आदमी ने इसकी शिकायत बादशाह से कर दी। बादशाह ने मुल्ला को दरबार में बुलाया।
मुल्ला बेफिक्री के साथ दरबार पहुंचा। मुल्ला के दरबार पहुंचते ही वह आदमी बोला- बादशाह सलामत, मुल्ला ने बहुत महीने पहले मुझसे 500 दीनार बतौर कर्ज लिए थे और अब तक नहीं लौटाए। मेरी आपसे दरख्वास्त है कि बिना किसी देरी के मुझे मेरा उधार वापस दिलाया जाए।
यह सुनने के बाद मुल्ला ने जवाब में कहा - हुजूर, मैंने इनसे पैसे लिए थे मैं यह बात मानता हूं और मैं उधार चुकाने का इरादा भी रखता हूं। अगर जरूरत पड़ी तो मैं अपनी गाय और घोड़ा दोनों बेचकर भी इनका उधार चुकाऊंगा।
तभी वह आदमी बोला - यह झूठ कहता है हुजूर इसके पास न तो कोई गाय है और न ही कोई घोड़ा। अरे इसके पास ना तो खाने को है और न ही एक फूटी कौड़ी है।
इतना सुनते ही मुल्ला नसीरूद्दीन बोला- जहांपनाह! जब यह जानता है कि मेरी हालत इतनी खराब है, तो मैं ऐसे में जल्दी इसका उधार कैसे चुका सकता हूं। जब मेरे पास खाने को ही नहीं है तो मैं उधार दूंगा कहां से। बादशाह ने यह सुना तो मामला रफा-दफा कर दिया। अपनी हाजिर जवाबी से मुल्ला नसीरूद्दीन एक बार फिर बच निकलने में कामयाब हो गया।
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ताबूत
एक स्थान पर कई मुस्लिम धर्मगुरु एकत्र हुए और कई विषयों पर चर्चा करते-करते उनमें इस बात पर विवाद होने लगा कि शवयात्रा के दौरान ताबूत के दायीं ओर चलना चाहिए या बायीं ओर चलना चाहिए।
इस बात पर समूह दो भागों में बाँट गया। आधे लोगों का कहना था की ताबूत के बायीं ओर चलना चाहिए जबकि बाकी लोग कह रहे थे कि बायीं ओर चलना चाहिए। उन्होंने मुल्ला नसीरुद्दीन को वहां आते देखा और उससे भी इस विषय पर अपनी राय देने के लिए कहा। मुल्ला ने उनकी बात को गौर से सुना और फ़िर हँसते हुए कहा - " ताबूत के दायीं ओर चलो या बायीं और चलो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सबसे ज़रूरी बात यह है कि ताबूत भीतर मत रहो ! "
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मुल्ला और पड़ोसी
एक पड़ोसी मुल्ला नसरुद्दीन के द्वार पर पहुंचा. मुल्ला उससे मिलने बाहर निकले .
'मुल्ला क्या तुम आज के लिए अपना गधा " मुझे दे सकते हो, मुझे कुछ सामान दूसरे शहर पहुंचाना है ? "
मुल्ला उसे अपना गधा नहीं देना चाहते थे, पर साफ़ -साफ़ मन करने से पड़ोसी को ठेस पहुँचती इसलिए उन्होंने झूठ कह दिया, मुझे माफ़ करना मैंने तो आज सुबह ही अपना गधा किसी उर को दे दिया है ."
मुल्ला ने अभी अपनी बात पूरी भी नहीं की थी कि अन्दर से ढेंचू-ढेंचू की आवाज़ आने लगी . 'लेकिन मुल्ला, गधा तो अन्दर बंधा चिल्ला " रहा है.", पड़ोसी ने चौकते हुए कहा. "
तुम किस पर यकीन करते हो.", मुल्ला बिना घबराए बोले, " गधे पर या अपने मुल्ला पर ?”
पडोसी चुप-चाप वापस चला गया .
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मुल्ला बने कम्युनिस्ट
एक बार खबर फैली की मुल्ला नसरुदीन कम्युनिस्ट बन गए हैं. जो भी सुनता उसे आश्चर्य होता क्योंकि सभी जानते थे की मुल्ला अपनी चीजों को लेकर कितने पोजेसिव हैं. जब उनके परम मित्र ने ये खबर सुनी तो वो तुरंत मुल्ला के पास पहुंचा.
मित्र : “ मुल्ला क्या तुम जानते हो कम्युनिज्म का मतलब क्या है ?"
मुल्ला : "हाँ, मुझे पता है." मित्र : " क्या तुम्हे पता है अगर तुम्हारे पास दो कार है और किसी के पास एक भी नहीं तो तुम्हे अपनी एक कार देनी पड़ेगी ' "
मुल्ला : "हाँ, और मैं अपनी इच्छा से देने के
लिए तैयार हूँ .
मित्र : " अगर तुम्हारे पास दो बंगले हैं और किसी के पास एक भी नहीं तो तुम्हे अपना एक बंगला देना होगा ?"
मुल्ला : " हाँ, और मैं पूरी तरह से देने को
तैयार हूँ ."
मित्र : " और तुम जानते हो अगर तुम्हारे पास दो गधे हैं और किसी के पास एक भी नहीं तो तुम्हे अपना एक गधा देना पड़ेगा ? "
मुल्ला : " नहीं, मैं इस बात से मतलब नहीं रखता, मैं नहीं दे सकता, मैं बिलकुल भी
ऐसा नहीं कर सकता . "
मित्र : " पर क्यों, यहाँ भी तो वही तर्क लागू
होता है ?"
मुल्ला : " क्योंकि मेरे पास कार और बंगले तो नहीं हैं, पर दो गधे ज़रूर हैं ."
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मुल्ला का प्रवचन
एक बार मुल्ला नसरुदीन को प्रवचन देने के लिए आमंत्रित किया गया. मुल्ला समय से पहुंचे और स्टेज पर चढ़ गए, " क्या आप जानते हैं मैं क्या बताने वाला हूँ ? मुल्ला ने पूछा.
"नहीं" बैठे हुए लोगों ने जवाब दिया .. यह सुन मुल्ला नाराज़ हो गए," जिन लोगों को ये भी नहीं पता कि मैं क्या बोलने वाला हूँ मेरी उनके सामने बोलने की कोई इच्छा नहीं है . " और ऐसा कह कर वो चले गए. उपस्थित लोगों को थोड़ी शर्मिंदगी हुई और उन्होंने अगले दिन फिर से मुल्ला नसरुदीन को बुलावा भेज.
इस बार भी मुल्ला ने वही प्रश्न दोहराया, क्या आप जानते हैं मैं क्या बताने वाला हूँ ?”
"हाँ", कोरस में उत्तर आया
“बहुत अच्छे जब आप पहले से ही जानते हैं तो भला दुबारा बता कर मैं आपका समय क्यों बर्वाद करूँ", और ऐसा खेते हुए मुल्ला वहां से निकल गए.
अब लोग थोडा क्रोधित हो उठे और उन्होंने एक बार फिर मुल्ला को आमंत्रित किया. इस बार भी मुल्ला ने वही प्रश्न किया, “क्या
आप जानते हैं मैं क्या बताने वाला हूँ ?" इस बार सभी ने पहले से योजना बना रखी थी इसलिए आधे लोगों ने "हाँ" और आधे लोगों ने "ना " में उत्तर दिया .
" ठीक है जो आधे लोग जानते हैं कि मैं क्या बताने वाला हूँ वो बाकी के आधे लोगों को बता दें. "
फिर कभी किसी ने मुल्ला को नहीं बुलाया !
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धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का
एक बार कक्षा दस की हिंदी शिक्षिका अपने छात्र को मुहावरे सिखा रही थी। तभी ATM एक मुहावरे पर आ पहुँची "धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का " इसका अर्थ किसी भी ο छात्र को समझ नहीं आ रहा था। इसीलिए अपने छात्र को और अच्छी तरह से समझाने के लिए शिक्षिका ने अपने छात्र को एक कहानी के रूप में उदाहरण देना उचित समझा।
उन्होंने अपने छात्र को कहानी कहना शुरू किया, " कई साल पहले सज्जनपुर नामक नगर में राजू नाम का लड़का रहता था, वह एक बहुत ही अच्छा क्रिकेटर था । वह इतना अच्छा खिलाड़ी था कि उसमे भारतीय क्रिकेट टीम में होने की क्षमता थी। वह क्रिकेट तो खेलता पर उसे दूसरो के कामों में दखल अन्दाजी करना बहुत पसंद था। उसका मन दृढ़ नहीं था जो दूसरे लोग करते थे वह वही करता था। यह देखकर उसकी माँ ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की कि यह आदत उसे जीवन में कितनी भारी पड़ सकती है। पर वह नहीं समझा। समय बीतता गया और उसका अपने काम के बजाय दूसरो के काम में दखल अन्दाजी करने की आदत ज्यादा हो गयी। जभी उससे क्रिकेट का अभ्यास होता था तभी उसके दूसरे दोस्तों को अलग खेलो का अभ्यास रहता था। उसका मन चंचल होने के कारण वह क्रिकेट के अभ्यास के लिए नहीं जाता था बल्कि दूसरे दोस्तों के साथ अन्य अलग-अलग खेल खेलने जाता था।
उसकी यह आदत उसका आगे बहुत ही भारी पड़ी, कुछ ही दिनों के बाद नगर में ऐलान किया गया नगर में सभी खेलों के लिए एक चयन होगा जिसमे जो भी चुना जाएगा उसे भारत के राष्ट्रीय दल में खेलने को मिल सकता है। सभी यह सुनकर बहुत ही खुश हुए और वहीं दिन से सभी अपने खेल में चुनने के लिए जी-जान से मेहनत करने लगे, सभी के पास सिर्फ दो दिन थे राजू ने भी अपना अभ्यास शुरू किया पर पिछले कुछ दिनों से अपने खेल के अभ्यास में जाने की बजाय दूसरो के खेल के अभ्यास में जाने के कारण उसने अपने शानदार फॉर्म खो दिया था। दो दिन के बाद चयन का समय आया राजू ने खूब कोशिश की पर अभ्यास की कमी के कारण वह अपना शानदार प्रदर्शन नहीं दिखा पाया और उसका चयन नहीं हुआ, वह दूसरे खेलों में भी चयन न हुआ क्योंकि वे सब खेल उसे सिर्फ थोड़ा आते थे ओर किसी भी खेल में वह माहिर नहीं था । जिसके कारण वह कोई भी खेल में चयन नहीं हुआ और उसके जो सभी दूसरे दोस्त थे उनका कोई न कोई खेल में चयन हो गया क्योंकि वे दिन रात मेहनत करते थे। अंत में राजू को अपने सिर पर हाथ रखकर बैठना पड़ा और वह धोबी के कुत्ते की तरह बन गया जो न घर का होता है न घाट का । "
इसी तरह इस कहानी के माध्यम से सभी बच्चों को इस मुहावरे का मतलब पता चल गया। शिक्षिका को अपने छात्रों को एक ही सन्देश पहुँचाना था कि वे जीवन में जो कुछ भी करे सिर्फ उसी में ध्यान दे और दूसरो से विचिलित हो वरना वह धोबी के कुत्ते की तरह बन जाएगे जो न घर का न घाट का होता है।
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जो कुआँ खोदता है वही गिरता है
एक बादशाह के महल की चहारदीवारी के अन्दर एक वजीर और एक कारिंदा रहता था। वजीर और कारिंदे के पुत्र में गहरी दोस्ती थी। हम उम्र होने के कारण दोनों एक साथ पढ़ते, खेलते थे। वजीर के कहने पर कारिंदे | का लड़का उसके सब काम कर देता था। वह वजीर को चाचा कहकर पुकारता था। बादशाह कारिंदे के पुत्र को बहुत प्रेम करता था। बादशाह के कोई संतान नहीं थी। इसलिए वे कारिंदे के पुत्र को अपने पुत्र के समान ही समझते थे। बादशाह ने उसे महल और दरबार में आने-जाने की पूरी छूट दे रखी थी कारिंदे के पुत्र के प्रति बादशाह का प्रेम देखकर वजीर को बहुत ईर्ष्या होती थी। वजीर चाहता था कि बादशाह केवल उसके पुत्र को ही प्रेम | करें। यदि बादशाह ने उसके पुत्र को गोद ले लिया तो बादशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र ही राजगद्दी पर बैठेगा । वजीर की इच्छा के विपरीत बादशाह का प्रेम कारिंदे के पुत्र के प्रति बढ़ता ही गया । बादशाह वजीर के पुत्र को जरा भी पसंद नहीं करते थे इसलिए वजीर कारिंदे और उसके पुत्र से मन-ही-मन ईर्ष्या करने लगा।
वजीर ने कारिंदे के पुत्र को मारने का निश्चय किया। वजीर ने कारिंदे के पुत्र को रुमाल और पैसे देकर गोश्त लाने के लिए कहा। वजीर ने कारिंदे के पुत्र को अच्छी तरह समझाया कि गोश्त बाजार में गली के नुक्कड़ वाली दुकान से ही लाना कारिंदे का बेटा रुमाल और पैसे लेकर बाजार की ओर चल दिया। उसने देखा कि उसका मित्र वजीर का बेटा भी वहाँ पर खेल रहा है। वजीर के लड़के ने कारिंदे के पुत्र से कहा कि तुम मेरा दांव खेलो में जाकर गोश्त ले आऊँगा । कारिंदे के पुत्र ने उसे पैसे और रुमाल देकर दुकान का पता बता दिया। इस प्रकार वजीर का पुत्र गोश्त लेने चला गया और कारिंदे का पुत्र दांव खेलने लगा। वजीर के पुत्र ने दुकानदार को पैसे और रुमाल देकर कहा कि इसमें गोश्त बाँध दो। कसाई ने रुमाल में बने हुए निशान को पहचान लिया। इस रुमाल को वजीर ने कसाई को दिखाते हुए कहा था कि जो लड़का इस रुमाल को लेकर गोश्त लेने आए तुम उसे मौत के घाट उतार देना । कारिंदे के पुत्र को मारने के लिए वजीर ने कसाई को पैसे भी दिए थे कसाई ने अन्दर भट्ठी जलाकर सारी तैयारी पहले ही कर ली थी।
कसाई ने रुमाल और पैसे लेकर उस लड़के को वहाँ बैठने के लिए कहा और स्वयं अन्दर गोश्त लेने चला गया। तभी वहाँ पर लड़का भी चला गया। कसाई ने तुरंत उस लड़के को उठाकर जलती हुई भट्ठी में झोंक दिया। कारिंदे का पुत्र अपना दांव खेलकर अपने घर जा रहा था कि उसे रास्ते में वजीर मिल गया । कारिंदे के पुत्र ने पूछा- 'चाचा, भैया गोश्त ले आया?" इतना सुनकर वजीर के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। तभी कारिंदे के पुत्र ने कहा - चाचा भैया ने मुझसे रुमाल और पैसे ले लिए थे और कहा कि तुम मेरा दांव खेल लो, मैं गोश्त लेकर घर चला जाऊँगा। मैंने भैया को दुकान का पता भी बता दिया था। वजीर की आँखों के आगे अँधेरा छा गया और उसके मुख से एक शब्द भी नहीं निकला। अपने पुत्र को याद करता हुआ वजीर अपने घर चला गया। वजीर कह रहा था कि जो दूसरों के लिए कुआँ खोदता है उसमें स्वयं गिरता है।
शिक्षा: इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि हमें कभी किसी का बुरा नहीं करना चाहिए। साभार :- कहावतों की कहानियाँ'
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कानून सबके के लिए बराबर है
शहंशाह बहुत न्यायप्रिय शासक थे। उन्होंने अपने महल के प्रवेशद्वार पर एक घंटा लगवा दिया था। जिसको भी शिकायत हो वह उस घंटे को बजा सकता था ताकि शहंशाह आवाज) को सुनकर न्याय कर सकें। उनके राज्य में गरीब-अमीर, छोटे-बड़े सबसे साथ न्याय किया जाता था। शहंशाह की दृष्टि में कानून सबके लिए बराबर था। शहंशाह अपराधी को दंड और निर्दोष को क्षमा करके सबके साथ न्याय करते थे। कई लोग न्याय के लिए शहंशाह के दरबार में अपनी शिकायतें लेकर आते थे।
शहंशाह की पत्नी नूरजहाँ एक दिन धनुर्विद्या का अभ्यास कर रही थी । नूरजहाँ ने कुछ चुने हुए निशानों पर ही तीर चलाए । अभ्यास करते-करते एक तीर नूरजहाँ ने हवा में चलाते हुए नदी की तरफ चला दिया जो वहीं कहीं गिर पड़ा। इसके बाद नूरजहाँ अपने महल लौट आई।
कुछ देर में महल के प्रवेशद्वार पर लगा हुआ घंटा जोर-जोर से बजने लगा पहरेदार ने देखा कि एक धोबन सिसकियाँ लेकर रो रही थी। उसके पास जमीन पर एक मृत शरीर रखा था और उसके हाथ में खून से सना हुआ तीर था। पहरेदार उस धोबन को शहंशाह के पास ले गया। धोबन शहंशाह को सलाम करके इंसाफ की दुहाई देने लगी। उसने शहंशाह को तीर दिखाते हुए कहा - 'हुजूर, इस तीर से किसी ने मेरे पति को मार डाला है, मुझे विधवा और मेरे बच्चों को अनाथ बना दिया है। अब मेरी और मेरे बच्चों की परवरिश कौन करेगा।" शहंशाह ने उस तीर को उठाकर देखा तो उस पर शाही मुहर लगी थी। शहंशाह समझ गए कि निश्चय ही इस दुःखद घटना को अंजाम किसी महल के ही व्यक्ति ने दिया है। उन्होंने पहरेदार को आदेश दिया - जिस दिन यह घटना हुई उस दिन धनुर्विद्या का अभ्यास कीन कर रहा था ? राजा का आदेश पाकर पहरेदार महल में गया और सच्चाई जानकार कुछ ही देर में वापस आ गया और बोला- हुजूर, उस दिन बेगम साहिबा धनुर्विद्या का अभ्यास कर रही थीं। शहंशाह ने तुरंत नूरजहाँ को दरबार में बुलाया। जैसे ही
नूरजहाँ दरबार में हाजिर हुई तो शहंशाह ने अपनी कमरबंद से छुरा निकालकर धोबन को देते हुए कहा - तुम नूरजहाँ की वजह से ही विधवा हुई हो, इसलिए तुम इस छुरे से मुझे मार कर नूरजहाँ को विधवा कर दो। ऐसा करने से तुम्हें न्याय जरूर मिलेगा। शहंशाह का न्याय सुनकर धोबन बहुत लज्जित हुई और बोली- हुजूर, आपकी हत्या करने से मेरा | पति जीवित नहीं होगा। फिर मैं आपके जैसे न्यायप्रिय शहंशाह की हत्या करने का पाप कैसे कर सकती हूँ धोबन की बात सुनकर शहंशाह बहुत खुश हुए और राजकीय कोष से उसे आर्थिक सहायता प्रदान की धोबन आर्थिक सहायता लेकर शहंशाह को धन्यवाद देती अपने घर चली गई।
धोबन के जाने के बाद नूरजहाँ ने शहंशाह से कहा आपने तो सचमुच बहुत खतरा मोल - ले लिया था। यदि वह महिला आपके आदेश का पालन कर देती तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता। शहंशाह ने कहा यदि मैं मर जाता तो उस महिला को इन्साफ मिल जाता। एक बात अवश्य याद रखना, कानून सबके लिए बराबर है।'
शिक्षा -इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती - है कि कानून की नजर में कोई छोटा-बड़ा नहीं है बल्कि सब बराबर हैं।
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बुरे का अंत बुरा
किसी जंगल में चार चोर रहते थे। वे चारों मिलकर चोरी करते और जो भी सामान उनके हाथ लगता उसे आपस में बराबर-बराबर बाँट लेते थे। वैसे तो वे चारों एक-दूसरे के प्रति प्रेम प्रकट करते थे, किन्तु मन-ही-मन एक-दूसरे से ईर्ष्या करते थे। वे चारों अपने मन में यही सोचते थे कि यदि किसी दिन मोटा माल मिल जाए तो वह अपने साथियों को मारकर सारा माल हड़प लेगा। चारों चोर मौके की तलाश में थे। किन्तु उन्हें ऐसा मौका अभी तक नहीं मिला था। चारों चोर बहुत ही दुष्ट और स्वार्थी प्रवृत्ति के थे।
एक रात चारों चोर चोरी की इच्छा में इधर-उधर घूम रहे थे। उन्होंने एक सेठ के घर में सेंध लगाई और घर के अन्दर घुसकर सोना-चाँदी, हीरे-जवाहरात, रूपया-पैसा सब कुछ लूटकर भाग गए। चारों चोर पुलिस से बचने के लिए दो दिन तक जंगल में भूखे-प्यासे भटकते रहे।
सेठ ने चोरी की शिकायत पुलिस में दर्ज करा दी थी। सेठ की पुलिस विभाग में भी अच्छी जान-पहचान थी। चोरों को पकड़ने के लिए शहर के चप्पे-चप्पे पर पुलिस फैली हुई थी। जंगल से निकलना चोरों के लिए खतरे से खाली नहीं था। चोरों की इच्छा थी कि अभी वे कुछ दिन जंगल में छिपे रहें।
धीरे-धीरे चोरों के पास खाने-पीने का सामान समाप्त हो गया। कुछ दिन तक तो उन्होंने भूख बर्दाश्त की, लेकिन जब भूख बर्दाश्त करना असंभव हो गया तो उन्होंने शहर से खाना मंगवाने का निश्चय कर लिया।
आपस में सलाह करके दो चोर शहर चले गए ताकि वहाँ की स्थिति का पता लगा सकें और अपने साथियों के लिए भोजन भी ले आएँ । उन्होंने शहर जाकर भरपेट खाना खाया और खूब शराब पी। उसके बाद उन्होंने योजना बनाई कि वे अपने दोनों साथियों को मारकर सारा माल खुद हड़प लेंगे।
दोनों ने योजना को अंजाम देने के लिए खाने में जहर मिला दिया और जंगल की ओर लौटने लगे। दोनों चोर अपने-अपने मन में यही सोच रहे थे कि खाना खाकर जब वे दोनों मर जाएंगे तो मैं इसे भी मार दूंगा और सारा माल हड़प कर अमीर बन जाऊँगा।
उधर जंगल में उन दोनों चोरों ने खाना लेने गए हुए साथियों को मारने की योजना बना ली। वे भी उन्हें मारकर सारा धन हड़प लेना चाहते थे।
जब दोनों चोर शहर से खाना लेकर आए तो जंगल में ठहरे हुए चोरों ने अपने साथियों पर हमला कर दिया और उन्हें मौत के घाट उतार दिया। अपने साथियों की हत्या करके वे दोनों चोर आराम से खाना खाने बैठ गए। खाने में पहले से जहर मिला होने के कारण वे दोनों भी तड़प-तड़प कर मर गए। इसलिए कहते हैं कि बुरे का अंत हमेशा बुरा ही होता है।
शिक्षा:- इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मनुष्य को बुरे काम नहीं करने चाहिए क्योंकि बुरे का अंत बुरा ही होता है।
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जिस की लाठी उस की भैंस
तो कहानी कुछ यों है कि एक ब्राह्मण को कहीं से यजमानी में एक भैंस मिली। उसे लेकर वह घर की ओर रवाना हुआ। सुनसान रास्ते में वह पैदल ही चला जा रहा था। बीच रास्ते में उसे एक चोर मिला। उसके हाथ में मोटा डण्डा था और शरीर से भी वो अच्छा तगड़ा था। उसने ब्राह्मण को देखते ही कहा- "क्यों ब्राह्मण देवता, खूब दक्षिणा मिली लगती है, पर यह भैंस तो मेरे साथ जाएगी।"
ब्राह्मण ने झट कहा- "क्यों भाई ?" चोर बोला "क्यों क्या? जो कह दिया सो करो। भैंस छोड़ कर चुपचाप यहाँ से चलते बनो, वरना लाठी देखी है, तुम्हारी खोपड़ी के टुकड़े टुकड़े कर दूँगा।"
अब तो ब्राह्मण का गला सूख गया। हालाँकि शारीरिक बल में वह चोर से कम नहीं था। पर खाली हाथ वह करे भी तो क्या करे? विपरीत समय में बुद्धिबल काम आया। ब्राह्मण बोला- "ठीक है भाई, भैंस भले ही ले लो, पर ब्राह्मण की चीज यों छीन लेने से तुम्हें पाप लगेगा। बदले में कुछ देकर भैंस लेते तो पाप से बच जाते।”
चोर बोला- “यहाँ मेरे पास देने को धरा क्या है?" ब्राह्मण ने झट कहा- "और कुछ न सही, लाठी देकर भैंस का बदला कर लो।"
चोर ने खुश हो कर लाठी ब्राह्मण को पकडा दी और भैंस पर दोंनो हाथ रख कर खड़ा हो गया। तभी ब्राह्मण कड़क कर बोला- "चल हट भैंस के पास से, नहीं तो अभी खोपड़ी दो होती है।"
चोर ने पूछा- क्यों?" " ब्राह्मण बोला- " क्यों क्या ? जिस की लाठी उस की भैंस । " चोर को अपनी बेवकूफी समझ आ गयी और उसने वहाँ से भागने में ही भलाई समझी। किसी ने सच ही कहा है कि जिसमें अक्ल है, उसमें ताकत है।
तो अब समझे कि यह कहावत यहीं से शुरू हुई, जिस की लाठी उस की भैंस ।
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सेर पर सवा सेर
एक बार अपनी समस्याओं पर विचार करने के लिए बहुत सारे खरगोश एक स्थान पर इकट्ठा हुए। एक खरगोश ने कहा- हम सभी जीवों से अधिक सुन्दर हैं। हमें खूंखार जानवर पशु-पक्षियों से हमेशा अपनी जान का खतरा बना रहता है। हमसे कोई भी नहीं डरता लेकिन हम सबसे डरते हैं। मनुष्य भी हमारा मांस खाने में कभी नहीं हिचकिचाते। हमें अपने जीवन का पल-पल खतरा बना रहता है।'
दूसरे खरगोश ने कहा- 'हाथी तो हमारा मांस नहीं खाते, लेकिन उनका शरीर इतना बड़ा है कि सैकड़ों खरगोश भाई हाथी के पैरों के नीचे कुचल कर मर जाते हैं।
तीसरे खरगोश ने कहा- 'भाइयो, इस संसार में केवल शक्तिशाली ही जीवित रह सकते हैं। हम जैसे दुर्बल
और छोटे जीवों का इस संसार में रहना बहुत मुश्किल है। मेरे विचार से तो हमारी समस्या का कोई समाधान नहीं है।'
सभी खरगोशों के निराशापूर्ण शब्द सुनकर एक बूढ़ा अनुभवी खरगोश बोला- मैंने अपनी समस्या का हल खोज लिया है, जो हमारे सभी कष्टों को दूर कर सकता है। हम सबको एक साथ नदी में कूदकर आत्महत्या कर लेनी चाहिए। मौत को गले लगाकर हम सारे दुःखों से मुक्ति पा सकते हैं।
बूढ़े खरगोश की बात सभी खरगोशों को बहुत पसंद आई। वे सब इकट्ठा होकर आत्महत्या करने के लिए एक नदी के किनारे चले गए। सभी खरगोशों में आत्महत्या करने की इतनी जल्दी थी कि वे सब आपस में झगड़ा करने लगे। खरगोशों को लड़ता देखकर नदी के किनारे बैठे सभी मेंढक बुरी तरह डर गए और जल्दी से पानी में कूद गए।
तभी बूढ़े खरगोश ने अपने साथियों को नदी
में कूदने से रोक लिया और उन्हें समझाते हुए कहा - भाइयो, हमें हिम्मत से काम लेना चाहिए और आत्महत्या का विचार छोड़कर अपने मन में जीने की इच्छा जाग्रत करनी चाहिए। हमें उन जीवों के बारे में भी सोचना चाहिए जो हमसे भी कमजोर हैं। हम से कमजोर जीव हमसे डरते हैं। इस संसार में हर प्राणी अपने से बड़े और शक्तिशाली से डरता है। इसीलिए तो कहते हैं कि सेर पर सवा सेर ।'
शिक्षा - इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती कि स्वयं को कभी भी कमजोर नहीं समझना चाहिए।
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घमंडी का सिर नीचा
एक जंगल में बाँस का पेड़ और एक जामुन का पेड़ पास-पास थे। जामुन का पेड़ बाँस के पेड़ की अपेक्षा बहुत मजबूत था । बाँस का पेड़ बहुत पतला होने के साथ-साथ बहुत लचीला भी था हवा का रुख जिस ओर होता बाँस का पेड़ उसी दिशा में झुक जाता था।
एक बार जामुन के पेड़ ने बाँस के पेड़ का उपहास करते हुए कहा- तुम तो हवा की आज्ञा का हमेशा ही पालन करते हो। हवा की गति और दिशा के अनुसार ही हमेशा हिलते डुलते हो मेरी तरह शान से सीधे क्यों नहीं खड़े होत? तुम भी हवा से कह दो कि उसकी आज्ञा का पालन नहीं कर सकते। तुम अपनी शक्ति का परिचय हवा को दो। इस संसार में बलवानों का ही चारों ओर बोलबाला है । '
बाँस के पेड़ को जामुन के पेड़ की बातें अच्छी नहीं लगीं लेकिन बाँस का पेड़ कुछ भी नहीं बोला और चुपचाप खड़ा रहा। यह देखकर जामुन का पेड़ क्रोधितहोकर बोला- तुम बात का उत्तर क्यों नहीं देते?" मेरी
बाँस के पेड़ ने कहा- तुम मेरी अपेक्षा मजबूत हो मैं बहुत कमजोर हैं। लेकिन मैं तुम्हे एक सलाह देता हूँ कि तेज हवा तुम्हारे लिए भी नुकसानदेह सिद्ध हो सकती है। यदि हवा की गति तेज हो तो हमें उसका सम्मान करना चाहिए। वरना कभी-कभी पछताना पड़ सकता है।'
जामुन के पेड़ को अपनी शक्ति पर बहुत घमंड था। वह बाँस के पेड़ से क्रोधित होकर बोला- 'तेज हवा भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती । मेरी इस बात को हमेशा याद रखना । '
धीरे-धीरे चलती हुई हवा ने बाँस के पेड़ और जामुन के पेड़ के बीच होने वाली सभी बातों को सुन लिया। हवा तेज गति से जामुन के पेड़ से टकराकर आगे निकल गई। थोड़ी देर बाद हवा ने अपने अन्दर कुछ शक्ति और समेटी और अपने को और भी गतिशील बना लिया। अब हवा एक तूफान के रूप में परिवर्तित हो गई। उस तेज हवा के टकराने से बॉस का पेड़ लगभग पूरा झुक गया। वही हवा अब जामुन के पेड़ से दोबारा जाकर टकरा गई लेकिन जामुन के पेड़ पर उस तेज हवा का कोई भी असर नहीं हुआ। वह उसी प्रकार पूर्ववत् खड़ा रहा।
कुछ देर बाद तूफानी हवा ने जामुन के पेड़ के पेड़ कीजड़ों पर जोर से प्रहार करके उन्हें कमजोर कर दिया। तूफानी हवाओं को जामुन के पेड़ की शाखाओं ने रोकने की भरपूर कोशिश की, लेकिन तेज हवाओं ने जामुन के पेड़ की शाखाओं को पीछे धकेल दिया। तेज हवाओं के कारण जामुन के पेड़ का संतुलन खो गया और जड़ों ने कमजोर होकर अपना स्थान छोड़ दिया कुछ ही देर में वह जामुन का पेड़ जमीन पर गिर पड़ा।
जामुन के पेड़ को धराशायी देखकर बाँस का पेड़ बहुत दुःखी हुआ। बाँस का पेड़ सोचने लगा- 'यदि जामुन के पेड़ ने मेरी बात मानकर हवा का सम्मान किया होता तो आज उसका अंत नहीं होता। यह जामुन का पेड़ तो घमंडी था। शायद इसे नहीं मालूम था कि घमंडी का सिर हमेशा नीचा ही होता है।'
शिक्षा- इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि घमंड ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। घमंडी व्यक्ति का सर्वनाश हो जाता है। इसलिए मनुष्य को कभी घमंड नहीं करना चाहिए।
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जैसा करोगे वैसा भरोगे
एक बुढ़िया थी। उसका एक ही बेटा था। वह हमेशा यही सपने देखती थी कि उसके बेटे का विवाह होगा तो बेटा और बहू दोनों मिलकर उसकी बहुत सेवा करेंगे और उसे घर का भी काम नहीं करना पड़ेगा। धीरे-धीरे वह दादी बन जाएगी और उसका घर स्वर्ग बन जाएगा।
आखिर वह दिन भी आ गया जब बुढ़िया के बेटे का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ। वह दादी भी बन गई लेकिन संयोग से उसका कोई भी सपना पूरा नहीं हुआ। बुढ़िया का बेटा तो सुबह काम पर चला जाता और पोता स्कूल चला जाता, तब बहू उसके साथ बहुत बुरा व्यवहार करती। बहू बुढ़िया से घर में झाड़ू लगवाती, झूठे बर्तन साफ़ करवाती और टूटे-फूटे बर्तनों में उसे भोजन देती।
शुरू में तो बहू अपने पति और बेटे के पीछे ही बुढ़िया से झगड़ती थी, लेकिन धीरे-धीरे वह अपने पति के सामने भी बुढ़िया का अपमान करने लगी। एक दिन टूटे बर्तनों में बुढ़िया को भोजन करते देखकर उसके बेटे को बहुत दुःख हुआ उसने अपनी माँ का पक्ष लेते हुए अपनी पत्नी को बहुत डांटा। पति-पत्नी दोनों में बहुत कहा सुनी हो गई। धीरे-धीरे बुढ़िया के बेटे ने भी पत्नी का विरोध करना छोड़ दिया।
धीरे-धीरे पोता बड़ा होने लगा तो वह अपनी माँ का विरोध करने लगा। वह अपनी दादी से बहुत प्यार करता था। अपनी दादी पर माँ द्वारा किए गए अत्याचारों को देखकर उसे बहुत दुःख होता था । उसे अपनी दादी से हमदर्दी और सहानुभूति थी। अपनी माँ के डर से वह दादी की कुछ भी मदद नहीं करता था। धीरे-धीरे पोता बड़ा हो गया और उसका विवाह भी हो गया।
पोते की नई बहू छिप छिपकर अपनी दादी सास पर होते अत्याचारों को चुपचाप देखती रहती थी लेकिन पतोहू को बुढ़ापे में दादी सास से काम करवाना जरा भी अच्छा नहीं लगता था जब कभी पतोहू बुढ़िया की काम करने में मदद करती तो उसकी सास उसे खूब डांटती । पतोहू जब कभी दादी सास को रोते हुए देखती तो उसे बहुत दुःख होता था।
एक बार बुढ़िया बीमार पड़ गई और परलोक सिधार गई। अब बुढ़िया की बहू पतोहू से ही घर का सारा काम कराती और उसके साथ अभद्र व्यवहार करती। जब पतोहू ने देखा कि उसकी सास दादी सास की तरह ही उस पर भी अत्याचार कर रही है तो उसने बदला लेने की ठान ली। वह भी अपनी सास से वैसा | व्यवहार करने लगी जैसा व्यवहार उसकी सास अपनी सास से करती थी। अब तो पतोहू अपनी सास को फूटी थाली में भोजन देने लगी। यह देखकर उसके पति और ससुर ने बहुत विरोध किया।
पतोहू ने अपने ससुर और पति से कहा- मेरी दादी सास जितनी मेहनती और सीधी थी जब माताजी उन्हें फूटी थाली में भोजन देती थीं तब तुम कुछ क्यों नहीं बोले। उन पर होने वाले अत्याचारों को तुम दोनों 'चुपचाप देखते रहे। तब क्या तुम्हारे मुख पर ताला पड़ गया था। यदि किसी ने माताजी की पैरवी की तो बुरा कोई न होगा।' मुझ से
पतोहू की बातें सुनकर उसका पति और ससुर कुछ नहीं बोले। उन्होंने भी उसका विरोध करना छोड़ दिया। ससुर को अपनी पत्नी के | साथ अभद्र व्यवहार देखकर बहुत गुस्सा भी आता था जब ससुर पतोहू को डाँटने लगे तो वह उनके साथ भी अभद्र व्यवहार करने लगी। सास-ससुर अकेले में बैठकर अपने सुख-दुःख की बातें करते और यही सोचते थे कि जैसा करोगे वैसा भरोगे।
शिक्षा: इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें सबके साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए क्योंकि जैसा व्यवहार हम दूसरों के साथ करेंगे वैसा ही व्यवहार दूसरे लोग हमारे साथ करेंगे।
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विनाश काले विपरीत बुद्धि
पाण्डवों के वन जाने के बाद नगर में अनेक अपशकुन हुए। उसके बाद नारदजी वहां आए और उन्होंने कौरवों से कहा कि आज से ठीक चौदह वर्ष बाद पाण्डवों के द्वारा कुरुवंश का नाश हो जाएगा. (कुछ) .... द्रोणाचार्य की ने बात सुनकर धृतराष्ट्र ने कहा गुरुजी का कहना ठीक है। तुम पाण्डवों को लौटा लाओ। यदि वे लौटकर न आवें तो उनका शस्त्र, सेवक और रथ साथ में दे दो ताकि पाण्डव वन में सुखी रहे। यह कहकर वे एकान्त में चले गए। उन्हें चिन्ता सताने लगी उनकी सांसे चलने लगी। उसी समय संजय ने कहा आपने पाण्डवों का राजपाठ छिन लिया अब आप शोक क्यों मना रहे हैं? संजय ने धृतराष्ट्र से कहा पांडवों से वैर करके भी भला किसी को सुख मिल सकता है। अब यह निश्चित है कि कुल का नाश होगा ही, निरीह प्रजा भी न बचेगी।
सभी ने आपके पुत्रों को बहुत रोका पर नहीं रोक पाए। विनाशकाल समीप आ जाने पर बुद्धि खराब हो जाती है। अन्याय भी न्याय के समान दिखने लगती है। वह बात दिल में बैठ जाती है कि मनुष्य अनर्थ को स्वार्थ और स्वार्थ को अनर्थ देखने लगता है तथा मर मिटता है। काल डंडा मारकर किसी का सिर नहीं तोड़ता। उसका बल इतना ही है कि वह बुद्धि को विपरित करके भले को बुरा व बुरे को भला दिखलाने लगता है। धृतराष्ट्र ने कहा मैं भी तो यही कहता हूं।
द्रोपदी की दृष्टि से सारी पृथ्वी भस्म हो सकती है। हमारे पुत्रों में तो रख ही क्या है? उस समय धर्मचारिणी द्रोपदी को सभा में अपमानित होते देख सभी कुरुवंश की स्त्रियां गांधारी के पास आकर करुणकुंदन करने लगी। ब्राहण हमारे विरोधी हो गए। वे शाम को हवन नहीं करते हैं। मुझे तो पहले ही विदुर ने कहा था कि द्रोपदी के अपमान के कारण ही भरतवंश का नाश होगा। बहुत समझा बुझाकर विदुर ने हमारे कल्याण के लिए अंत में यह सम्मति दी कि आप सबके भले के लिए पाण्डवों से संधि कर लीजिए। संजय विदुर की बात धर्मसम्मत तो थी लेकिन मैंने पुत्र के मोह में पड़कर उसकी प्रसन्नता के लिए उनकी इस बात की उपेक्षा कर दी।
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तिरिया से राज छिपे न छिपाए
किसी गाँव में एक पति-पत्नी बड़े प्रेम से रहते थे। दोनों को एक-दूसरे पर पूरा-पूरा विश्वास था । पत्नी के प्रेम के कारण पति अपने घरवालों से अलग हो गया था। पति यह जानता था कि उसके माता-पिता बहुत सीधे हैं लेकिन फिर भी वह अपनी पत्नी के लिए उनसे लड़ता था । वह हमेशा ही अपनी पत्नी का पक्ष लेता था। विशेष बात को भी वह माता-पिता, भाई-बहन को न बताकर सिर्फ अपनी पत्नी को ही बताता था।
एक दिन वह घूमता हुआ गाँव के काका के पास गया। काका बहुत ही अनुभवी व्यक्ति थे। उसने काका से अपनी पत्नी की प्रशंसा की। उसने काका को बताया कि 'बड़े-से-बड़े राज भी वह अपनी पत्नी से नहीं छिपाता, वह पूरे घर को शक की नज़र से देख सकता है लेकिन अपनी पत्नी पर कभी शक नहीं करेगा।'
उसके चुप होने के बाद काका ने कहा- 'देखो बेटा, अपनी पत्नी पर जरुरत से ज्यादा विश्वास करना ठीक नहीं है। पहले अपनी पत्नी की परीक्षा लेकर देखो फिर तुम्हें पता चलेगा कि वह कितनी राज की बात छिपा सकती है। कभी-कभी सच्चा प्रेम करने वाली स्त्रियाँ भी नासमझी में अपने पति की भलाई करने के चक्कर में उनका अहित कर बैठती हैं।'
काका की बात सुनकर वह व्याकुल हो गया और उसने अपनी पत्नी की परीक्षा लेने का निश्चय कर लिया। उसने काका की सलाह से एक योजना भी बना ली। एक दिन वह अंगोछे में कटा हुआ तरबूज लेकर आया। उसमें से लाल बुँदे टपक रही थीं।
उसने अपनी पत्नी से कहा-' आज मैंने एक आदमी का सिर काट दिया। इस बात को राज ही रखना। यदि गाँव में यह बात किसी को पता चल गई तो पुलिस मुझे पकड़कर ले जाएगी और मुझे फाँसी की सजा मिलेगी।'
उसने अपनी पत्नी से फावड़ा माँगा और घर के पीछे एक पेड़ अंगोछे में लिपटे हुए तरबूज को गड्ढा खोदकर जल्दी से दबा दिया और ऊपर से मिट्टी डालकर जगह को समतल बना दिया।
उसकी पत्नी इस घटना के बाद परेशान रहने लगी। उसने अपने पति से कुछ नहीं कहा लेकिन उसे अन्दर ही अन्दर बहुत घुटन महसूस हो रही थी वह अपने मन के बोझ को किसी से कहकर हल्का करना चाहती थी। दुःखी हो कर उसने यह बात अपनी पड़ोसन को बता दी। उसने पड़ोसन को कसम दी कि वह इस बात को किसी को न बताए वरना उसके पति को फाँसी हो जाएगी।
उस महिला ने यह बात अपनी पड़ोसन को बता दी। यह बात एक ने दूसरे को, दूसरे ने तीसरे को तीसरे ने चौथे को बता दी। इस प्रकार यह बात पूरे गाँव में फैलते फैलते पुलिस थाने में भी पहुँच गई।
दूसरे दिन दरोगा साहब कुछ सिपाहियों को लेकर उसके घर पहुँच गए। दरोगा ने उसकी | पत्नी से पूछा- जल्दी बताओ कि तुम्हारे पति ने सिर कहाँ पर दबाया है? यदि तुमने सच-सच नहीं बताया तो तुम्हें फाँसी लग जाएगी।'
दरोगा की डांट सुन कर उसकी पत्नी डर गई वह स्थान दिखा दिया जहाँ पर उसके पति ने गड्ढा खोदकर कुछ दबाया था। पुलिस ने उस स्थान को खोदकर अंगोछे में लिपटा हुआ तरबूज निकाल लिया।
वहाँ पर काका भी उपस्थित थे। उन्होंने पुलिस को बता दिया कि इसने अपनी पत्नी की परीक्षा लेने के लिए ही यह नाटक किया था। इसके बाद सब लोग अपने-अपने घर चले गए। काकाजी ने कहा कि तिरिया से राज छिपे न छिपाए।
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देखना है ऊँट किस करवट बैठता है
एक गाँव में सप्ताह में एक बार हाट लगती थी। दाल, सब्जी, अनाज, कपड़े यानि घर-गृहस्थी @ का सारा सामान उस हाट में मिल जाता था। आस-पास के गाँवों से भी लोग उस हाट से सामान खरीदने आते थे। दुकानदार हाट में बेचने के लिए अपना सामान बैलगाड़ी, ऊँट, खच्चर पर लादकर लाते थे। छोटे-छोटे दुकानदार तो सामान को सिर पर ही रख लाते थे। उस गाँव में कुंजड़ा और कुम्हार भी रहते थे। वे दोनों भी अपना सामान हाट में ले जाकर बेचते थे। कुंजड़ा हाट में सब्जी और फल बेचता था और कुम्हार को हाट में सामान ले जाने का भाड़ा बहुत देना पड़ता था, जिसके कारण उन्हें मुनाफा बहुत कम होता था ।
उसी गाँव में एक ऊँट वाला भी रहता था। कुंजड़ा और कुम्हार ने सोचा कि वे अपना सामान हाट में ऊँट पर लादकर ले जाएँगे और भाड़ा आधा-आधा चुका देंगे। ऐसा करने से दोनों को ही फायदा होगा। जैसे ही हाट का दिन आया तो कुंजड़े ने ऊँट की पीठ पर एक ओर अपनी सब्जियाँ और फल लाद दिए तो दूसरी ओर कुम्हार ने अपने मिट्टी के बर्तन ने लाद दिए। दोनों ऊँट के साथ-साथ चलने लगे। ऊँट वाला भी रस्सी पकड़कर आगे-आगे चल रहा था। थोड़ी दूर चलने पर ऊँट ने अपनी गर्दन घुमाई तो उसे सब्जियों के पत्ते लटकते हुए दिखाई दिए। ऊँट की डोरी लम्बी होने के कारण उसने गर्दन पीछे करके सब्जियों के पत्ते खा लिये।
कुंजड़े को यह देखकर बहुत दुःख हुआ। कुछ ही देर में ऊँट ने जब दोबारा गर्दन पीछे करके सब्जियों के पत्ते खाए तो कुंजड़े ने ऊँट वाले से कहा- 'भैया, ऊँट सब्जियाँ खा रहा है। इसकी डोरी खींचकर रखो। वरना यह सारी सब्जियाँ खराब कर देगा।' ऊँट वाले ने कुंजड़े की बात मानकर रस्सी खींचकर पकड़ ली। लेकिन ऊँट अपनी आदत से बाज नहीं आया और बार-बार पीछे गर्दन करके सब्जियों को खाता रहा। कुंजड़े का नुकसान होता देखकर कुम्हार को बहुत मजा आ रहा था कुम्हार तो कुंजड़े का मजाक बनाने लगा। कुंजड़ा अपने मन में सोचने लगा कि हाट पहुँचते-पहुँचते सब्जियों का भार कम हो जाएगा।
सब्जियों का भार कम होते देखकर कुम्हार हँसने लगा। तब कुंजड़े ने कहा- 'देखना है ऊँट किस करवट बैठता है?' धीरे-धीरे सब्जियों का भार कम हो गया तो बर्तनों का झुकाव नीचे की ओर अधिक हो गया। कुम्हार को देखकर चिंता होने लगी । कुम्हार यह सोचने लगा कि देखना है कि ऊँट किस करवट बैठता है। जब ऊँट हाट में पहुँच गया तो कुंजड़े और कुम्हार ने अपना सामान लगाने के स्थान पर ऊँट को बैठा दिया। बर्तनों का भार अधिक होने के कारण ऊँट उसी करवट से बैठ गया। बेचारे कुम्हार के सारे बर्तन टूट गए। कुंजड़े ने कुम्हार का नुकसान होते देखकर कहा - 'देखना है, ऊँट किस करवट बैठता है?"
शिक्षा:- दूसरों का नुकसान होते देखकर खुश नहीं होना चाहिए।
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बिल्ली के गले में घंटी
एक बहुत बड़े घर में सैकड़ों चूहे रहते थे। वे चारों ओर उछल कूद करते हुए अपना पेट - आराम से भर लेते थे और फिर जब उन्हें खतरा दिखाई देता तो बिल में जाकर छिप जाते थे। एक दिन उस घर में न जाने कहाँ से एक बिल्ली आ गई। बिल्ली की नज़र जैसे ही चूहों पर पड़ी तो उसके मुँह में पानी आ गया।
बिल्ली ने उन चूहों को खाने के विचार से उसी घर में अपना डेरा डाल दिया। बिल्ली को जब कभी भूख लगती तो वह अँधेरे स्थान में छिप जाती और जैसे ही चूहा बिल से बाहर आता तो उसे मारकर खा जाती । अब तो बिल्ली रोज चूहों का भोजन करने लगी। इस प्रकार वह कुछ ही दिनों में मोटी ताजी हो गई।
बिल्ली के आ जाने से चूहे दुःखी हो गए। धीरे- धीरे चूहों की संख्या कम होती देख वे भयभीत हो गए। चूहों के मन में बिल्ली का डर बैठ गया। बिल्ली से बचने का कोई उपाय खोजने के लिए सभी चूहों ने मिलकर एक सभा का आयोजन किया। सभा में सभी चूहों ने अपने - अपने विचार प्रस्तुत किए, लेकिन कोई भी प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास नहीं हो सका। सभी चूहों में निराशा फैल गई।
तब एक बूढ़ा चूहा अपने स्थान पर खड़ा होकर बोला भाइयो सुनो, मैं तुम्हें एक सुझाव | देता हूँ, जिस पर अमल करके हमारी समस्या का हल निकल सकता है। यदि हमें कहीं से एक घंटी और धागा मिल जाए तो हम घंटी को बिल्ली के गले में बाँध देंगे। जब बिल्ली चलेगी तो उसके गले में बँधी हुई घंटी भी बजने लगेगी। घंटी की आवाज़ हमारे लिए खतरे का संकेत होगी। हम घंटी की आवाज़ सुनते ही सावधान हो जाएँगे और अपने अपने बिल में जाकर छिप जाएंगे।
बूढ़े चूहे का यह सुझाव सुनकर सभी चूहे ख़ुशी से झूम उठे और अपनी ख़ुशी प्रकट करने के लिए वे नाचने गाने लगे। चूहों का विचार था कि अब उन्हें बिल्ली से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी और वे फिर से निडर होकर घूम सकेंगे।
तभी एक अनुभवी चूहे ने कहा - चुप रहो, तुम सब मुर्ख हो। तुम इस तरह तरह खुशियाँ मना रहे हो, जैसे तुमने कोई युद्ध जीत लिया हो। क्या तुमने सोचा है कि बिल्ली के गले में जब तक घंटी नहीं बंधेगी तब तक हमें बिल्ली से मुक्ति नहीं मिल सकती।
अनुभवी चूहे की बात सुनकर सारे चूहे मुँह लटकाकर बैठ गए। उनके पास अनुभवी चूहे के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था। तभी उन्हें बिल्ली के आने की आहट सुनाई दी और सारे चूहे डरकर अपने- अपने बिलों में घुस गए। में
शिक्षा - इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि योजनाएँ बनाने से किसी भी समस्या का हल नहीं होता । समस्या का समाधान करने के लिए उन योजनाओं पर अमल करना आवश्यक है।

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