नाम हो या काम, कोई दाग बर्दाश्त नहीं: मंत्रियों को मोदी की हिदायत

नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैबिनेट मीटिंग में अपने सभी मंत्रियों से योजनाओं को समय से पूरा करने के साथ-साथ जनता को पारदर्शी और प्रभावी शासन देने की बात कही. इसके साथ ही उन्होंने बैठक में सभी मंत्रियों को साफ कर दिया कि नाम हो या काम, कोई दाग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. हर किसी को पूरी जवाबदेही के साथ जिम्मेदारी निभाते हुए जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा.

नरेंद्र मोदी ने कैबिनेट में…

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राजनीति और भ्रष्टाचार का साथ फिर उजागर

राजनीति और भ्रष्टाचार का साथ फिर उजागर
पिछले सप्ताह आई अंतरराष्ट्रीय संस्था ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार. भ्रष्टाचार के मामले में भारत 95वें नंबर पर है। साफ सुथरी छवि और कम से कम भ्रष्टाचार के लिए न्यूजीलैंड पहले नंबर पर है. यानी न्यूजीलैंड में सबसे कम भ्रष्टाचार है। दूसरे नंबर पर डेनमार्क और फिनलैंड हैं,तो इसके बाद स्वीडन और सिंगापुर का नंबर है, जबकि नॉर्वे, नीदरलैंड्स, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड और कनाडा भी प्रथम दस में शामिल है। ज्ञातव्य हैं पिछली बार भारत 87वें नंबर पर था. लेकिन इस बार उसकी स्थिति और खराब होने के कारण 95वें स्थान पर पहुँच गया है। हमारे नेताओं के लिए संतोष की बात यह हो सकती है कि पाकिस्तान में भ्रष्टाचार की स्थिति और भी खराब है और वह 134 वें, इराक 175वें और अफगानिस्तान 180वें नंबर पर है।
इस तरह भ्रष्टाचार बेशक विश्वव्यापी समस्या दिखाई देता हो लेकिन चिंतन का विषय यह है कि स्वयं हमारी बीमारी कुछ ज्यादा ही गंभीर हो चली है। उज्जैन के एक चपरासी के घर करोड़ों की सम्पति मिलने के समाचार के साथ दिल्ली की जो तस्वीर एक स्टिंग ऑपरेशन ने दिखाई है वह शर्मनाक है क्योंकि अब तक भ्रष्टाचार के आरोप इंजीनियरों व अधिकारियों पर लगते थे लेकिन इस गंदे धंधे में भाजपा और कांग्रेस के पार्षद भी आकंठ डूबे हुए पकड़े गए हैं। अवैध निर्माण कराने के लिए रिश्वत मांगते कैमरे पर पकड़े गए दिल्ली के ऐसे ही आठ पार्षदों को बेशक उनकी पार्टियों ने अपने दल सेे निलंबित कर दिया लेकिन इतने भर से बात खत्म नहीं होती। अनुभवी जानते हैं कि जो नहीं पकड़े गए उन सभी को भी ईमानदार नहीं माना जा सकता। सबसे ज्यादा शर्म की बात है कि राजधानी का प्रथम नागरिक कहे जाने वाले महापौर जैसे महत्वपूर्ण पद पर विराजित रही कांग्रेस की नेता जयश्री पंवार भी शामिल हैं। इस स्टिंग ऑपरेशन में भाजपा के छह और कांग्रेस के दो पार्षद कैमरे के सामने अवैध निर्माण करवाने के लिए रिश्वत मांग रहे थे। भाजपा और कांग्रेस दोनों के प्रदेश अध्यक्षों ने फरमाया है कि उनके दल में भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के लिए कोई जगह नहीं है। लेकिन दोनो ही इस बात पर खामोश रहे कि क्या वे अपने पार्षदों की हरकतों से अनजान थे? यदि हाँ तो क्या आपके संगठन के तंत्र को नकारा नहीं माना जाना चाहिए?
पिछले दिनों गिरी बिल्डिंग में अनेक कीमती जाने गई तो सभी नेताओं ने अपना-अपना पल्ला झाड़ लिया और अधिकारियों को दोषी बताया लेकिन अपने अधीनस्थ अधिकारियों, कर्मचारियों को इस तरह बेकाबू छोड़ देने की नैतिक जिम्मेवारी से वे स्वयं को कैसे मुक्त कर सकते हैं? आज दिल्ली की हजारों अनाधिकृत कालोनियों में बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण हो रहे हैं (हालांकि इस अवैधता में नियमों का भी दोष है जो अनावश्यक समस्याएं खड़ी करते हैं) क्या उस क्षेत्र के विधायक और निगम पार्षद को इनकी जानकारी नहीं होती? क्या उन्हें भी अधिकारियों द्वारा की जा रही वसूली में से हिस्सा नहीं मिलता? पकड़े जाने पर पार्टी से निकालना बिल्ली को देखकर आंखें मूंदने जैसा है। यदि कांग्रेस और भाजपा नेतृत्व भ्रष्टाचार के प्रति जरा भी गंभीर और ईमानदार है तो उसे स्पष्ट घोषणा करनी चाहिए-‘हमारे जिस पार्षद पर हमारे अपने एक भी कार्यकर्ता ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाया तो उसे अगले चुनाव में उम्मीदवार बनाने पर विचार भी नहीं किया जाएगा।’
बात निगम नेताओं तक ही सीमित होती तो सोचा जाता, यहाँ तो नित्य प्रति होने वाले घोटालें साबित करते हैं कि राजनीतिज्ञों और भ्रष्टाचार का चोली-दामन का साथ है और हमने यदि जल्द ही कुछ नहीं किया तो फिर भारत को विकसित देश बनाने का सपना चकनाचूर हो जाएगा। जहाँ तक राजनैतिक- प्रशासनिक और आपराधिक गठजोड़ भ्रष्टाचार का प्रश्न है, क़ानून की निष्क्रियता के साथ-साथ हमारे अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए खामोश रहने की प्रवृति स्थिति को और भी गंभीर बनाती है। अनशन और फिर रथयात्रा से पिछले दिनों भ्रष्टाचार का मुद्दा तूफान की तरह उठा और सभी के बीच चर्चा का विषय बन गया।
भारत में वैसे तो अनेक समस्याएं विद्यमान हैं जिसके कारण देश की प्रगति धीमी है। उनमें प्रमुख है बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, आदि लेकिन वर्तमान में सबसे ज्यादा यदि कोई देश के विकास को बाधित कर रही है तो वह है भ्रष्टाचार की समस्या। यह लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करने का कार्य कर रहा है। वास्तव में यह स्थिति सिर्फ एक दिन में ही नहीं बनी है। भारत को जैसे ही अंग्रेजी दासता से मुक्ति मिलने वाली थी उसे खुली हवा में सांस लेने का मौका मिलने वाला था उसी समय सत्तालोलुप नेताओं ने देश का विभाजन कर दिया और उसी समय स्पष्ट हो गया था कि कुछ विशिष्ट वर्ग अपनी राजनैतिक भूख को शांत करने के लिए देश हित को ताक मे रखने के लिए तैयार हो गये हैं। खैर बीती ताहि बिसार दे। उस समय की बात को छोड वर्तमान स्थिति में दृष्टि डालें तो काफी भयावह मंजर सामने आता है। भ्रष्टाचार ने पूरे राष्ट्र को अपने आगोश में ले लिया है। वास्तव में भ्रष्टाचार के लिए आज सारा तंत्र जिम्मेदार है। एक आम आदमी भी किसी शासकीय कार्यालय में अपना कार्य शीध्र करवाने के लिए सामने वाले को बंद लिफाफा सहज में थमाने को तैयार है। 100 में से 80 आदमी आज इसी तरह कार्य करवाने के फिराक में है। और जब एक बार किसी को अवैध ढंग से ऐसी रकम मिलने लग जाये तो निश्चित ही उसकी तृष्णा और बढेगी और उसी का परिणाम आज सारा भारत देख रहा है।
भ्रष्टाचार में सिर्फ शासकीय कार्यालयों में लेन-देन वाले घूस को ही शामिल नहीं किया जा सकता बल्कि इसके दायरे में वे सारे आचरण शामिल हैं जो एक सभ्य समाज के सिर को नीचा करने में मजबूर करते हैं। भ्रष्टाचार के इस तंत्र में आज सर्वाधिक प्रभाव राजनेताओं का ही दिखाई देता है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण तो तब देखने को मिला जब चुने हुए सांसदों के द्वारा संसद भवन में प्रश्न पूछने के लिए पैसे लेने का प्रमाण कुछ टीवी चैनलों द्वारा प्रदर्शित किया गया। कभी कफन घोटाला, कभी चारा, भूसा घोटाला, कभी दवा घोटाला, कभी ताबूत घोटाला तो कभी खाद घोटाला आखिर ये सब क्या इंगित करता है। भारत को भ्रष्टाचार से बचाने के लिए स्वयं भ्रष्ट आचरण में आकंठ डूबे लोग इस पूरे अभियान का उपहास करते प्रतीत होते है। वास्तव में देश से यदि भ्रष्टाचार मिटाना है तो ने सिर्फ साफ स्वच्छ छवि के नेताओं का चयन करना होगा बल्कि लोकतंत्र के नागरिको को भी सामने आना होगा। उन्हें प्राण-प्रण से यह प्रयत्न करना होगा कि उन्हें भ्रष्ट लोगों को समाज से न सिर्फ बहिष्कृत करना होगा बल्कि उच्चस्तर पर भी भ्रष्टाचार में संलिप्त लोगों से दूरी बनानी है। अपनी आम जरूरतों को पूरा करने एवं शीध्रता से निपटाने के लिए ‘कुछ ले-दे कर मामला निपटाने’ की प्रवृत्ति से बचना होगा। कुल मिलाकर जब तब लोकतंत्र में आम नागरिक एवं नेतृत्व दोनों ही मिलकर यह नहीं चाहेंगे तब तक भ्रष्टाचार के जिन्न से बच पाना असंभव ही है।
जब हम भ्रष्टाचार की बात करते हैं तो हमें देखना चाहिए कि भ्रष्टाचार का स्रोत कहाँ है । सबसे पहले यह समझना चाहिए कि आचरण का भ्रष्ट हो जाना ही भ्रष्टाचार है। आचरण का प्रतिनिधित्व सदैव नैतिकता करती है। किसी का नैतिक उत्थान अथवा पतन उसके आचरण पर भी प्रभाव डालता है। आधुनिक शिक्षा पद्धति और सामाजिक परिवेश मे बच्चों के नैतिक उत्थान के प्रति लापरवाही बच्चे को पूरे जीवन प्रभावित करती है। हमारा बच्चा दस रूपये लेकर बाज़ार जाता है। अगर दो रूपये बचते हैं तो चाहे घर वालों की लापरवाही अथवा छोटी बात समझ कर अनदेखा करने के कारण, बच्चा उन पैसों को छुपा लेता है और धीरे -धीरे यह आदत उसके जीवन का अंग बन जाती है। इस तरह जीवन की पहली सीढ़ी पर ही उसे उचित मार्गदर्शन, नैतिकता का पाठ, और औचित्य-अनौचित्य मंे भेद करने का ज्ञान न होने से भ्रष्टाचार का पहला स्कूल परिवार बन जाता है।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण है छोटे और सुगम रास्ता खोजने का प्रयास। अपने लाभ के लिए छोटा रास्ता चुनने वाले भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं।
कई बार परिवेश और परिस्थितियाँ भी भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार होती हैं। हर मनुष्य को जीवन यापन के लिए धन और सुविधाओं की कुछ न्यूनतम आवश्यकताएँ होती हैं। कुछ दशकों मंे पूरी दुनिया मे आर्थिक असमानता और धन की हवस बहुत तेजी से बढ़ी है। राजनीति के प्रति बढ़ते आकर्षण का कारण भी धन की बढ़ती हवस है जो अंतत भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। जब महत्वाकांक्षा बढ जाती है तो नैतिक मार्ग से पार पाना लगभग असंभव हो जाता है। ऐसे मे भ्रष्टाचार हावी हो जाता हैं। एक प्रमुख भ्रष्टाचार से निपटने के लिए प्रभावी कानून के क्रियान्वयन मे खामियाँ होना। इसी कारण भ्रष्टाचारी को दण्ड दिलाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
जरूरत है अपने राजनैतिक सिस्टम को सुधारने की। आज की चुनावी व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन किये बिना किसी सुधार की आशा व्यर्थ है। एक नहीं, हजारों लोकपाल या अन्ना आ जाए कुछ नहीं होने वाला। यदि चुनावों में कालेधन के प्रयोग, शराब, नोट बांटने पर अंकुश ही नहीं लगा तो सुधार की आशा हवा में गांठ लगाने जैसी होगी।
पहले टिकट पाने के लिए थैली चढ़ाना फिर चुनाव प्रचार से ज्यादा धन अनुचित तरीकों पर खर्च करना, उसपर भी जीतने की कोई गांरटी नहीं। यदि जीत गए तो क्या करोड़ों खर्च करने वाला उन्हें वसूलेगा या नहीं? यदि इस साधारण सी बात पर चिंतन नहीं किया गया तो समझा जा सकता है कि भ्रष्टाचार का विरोध ढ़ोंग है, दिखावा है। सभी अपने पाप को तो छिपाना चाहते हैं लेकिन दूसरों के छोटे-से-छोटे अवगुण को भी बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं। जो कल तक हमारे ही क्षेत्र में टूटी चप्पलें पहन कर घूमते थे, चाय मांग कर पीते थे आज राजनीति में आने के बाद उनके बच्चे विदेशों में पढ़ते है तो उन्हें इसका स्रोत भी बताना चाहिए वरना उनके द्वारा भ्रष्टाचार पर बहस व्यर्थ और संसाधनों का दुरुपयोग कहलाएगी।
यह भी सोचना होगा कि आखिर काला धन उत्पन्न ही क्यों होता है? क्या नियमों को जरूरत से ज्यादा कड़ा बनाना ही तो इसके लिए जिम्मेवार नहीं है? क्या आयकर की सीमा बढ़ाकर 5 लाख करने का उचित समय नहीं आ गया है?

Vinod Babbar, Editor-Rashtra kinkar Mob 09868211911

क्या येदियुरप्पा के अलग होने से फूटी बीजेपी की किस्मत

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में बीजेपी को अपनी हार की आशंका तो वोटिंग से पहले ही सताने लगी थी। राजनीतिक विश्लेषक भी उसकी हार की भविष्यवाणी करते नजर आ रहे थे, लेकिन पार्टी राज्य में तीसरे नंबर पर चली जाएगी, ये तो उसके धुर विरोधियों ने भी नहीं सोचा होगा।

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