निंदा की आँधी में भी वे सदा जगमगाते हैं

निंदा की आँधी में भी वे सदा जगमगाते हैं जब कोई दीया जलता है, तो आँधी–तूफान उसको बुझाने में लगते हैं | ऐसे ही जब–जब धरती पर महापुरुष आये, तब-तब निंदकरूपी आँधी–तूफ़ान भी आये | निंदकलोग स्वामी विवेकानंदजी के लिए कुछ का कुछ बकते थे, स्वामी रामतीर्थ जी के लिए कुछ का कुछ लिखते थे, लेकिन संत-रुपी दीये तो जगमगाते रहते हैं, औरों को रोशनी देते रहते हैं | इसी कारण अभी भी समाज में जो आनंद, मौज, माधुर्य और भगवदरस छलकता है, वह उन त्यागी पुरुषों का, हिम्मतवाले साहसी महापुरुषों का ही तो प्रसाद है | महात्मा बुद्ध गालियाँ सहते थे, संत तुकाराम को निंदक उलटे मुँह, गधे पर बैठाते थे और गाँव में उनको घुमाते थे | सुकरात को जहर दिया गया | ॠषि दयानन्द, स्वामी रामतीर्थ, स्वामी विवेकानन्द, कबीर जी आदि संतों को निंदकों ने सताने का प्रयास किया | यह तो इस दुष्ट युग, कलियुग की बात है लेकिन रामराज्य में वशिष्ठजी महाराज कहते हैं कि “हे राम जी! मूर्ख लोग मेरे लिए क्या–क्या बोलते हैं, हँसते हैं! मुझे सब पता है लेकिन मैं उनको क्षमा कर देता हूँ | कैसे-भी वे संसाररूपी कीचड़ से निकलें |” राजा दशरथ जिनकी चरणरज लेकर घूमते हैं और भाग्य बनाते हैं, रामचंद्र जी जिनको प्रणाम करते हैं एवं अपना अहोभाव व्यक्त करते हैं, ऐसे वशिष्ठ जी के लिए भी कुछ लोग, कुछ की कुछ अफवाह फैला सकते हैं, तो तुम्हारे लिए कोई कुछ बोले तो तुम फिक्र मत करना | तुम्हारे सद्गुरु के लिए कोई कुछ बोले तो उनके चक्कर में मत आना, तुम तो चौरासी के चक्कर को हटाकर आत्मस्थ होना, यही तुम्हारा उद्देश्य हो |

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